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सिद्धार्थ कैसे बने गौतम बुध | लुम्बिनी जहां जन्मे थे महात्मा बुद्ध | भगवान बुध की महागाथा

सिद्धार्थ कैसे बने गौतम बुध



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गौतम बुद्ध से संबद्ध स्मारकों में चार स्मारक अति महत्वपूर्ण है पहला जन्म स्थान लुम्बिनी , दूसरा बुद्धत्व अर्थात ज्ञान प्राप्ति का स्थान बोध गया में उरुवेला , तीसरा तथागत का प्रथम धर्म उपदेश स्थल सारनाथ और चौथा भगवान बुद्ध का निर्वाण स्थल कुशीनगर । 



इन सभी चार स्थलों में सबसे महत्वपूर्ण स्थल है लुम्बिनी , जिसे भगवान बुद्ध का जन्म स्थान होने का गौरव प्राप्त है लुम्बिनी का संबंध भगवान बुद्ध के जीवन से है । बौद्ध साहित्य तथा एतिहासिक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि लगभग 563 ई.पू. में गौतमबुद्ध की माता देवी कपिलवस्तु से अपने मायके ( देवादहा ) जा रही थीं 



कि लुम्बिनी के जंगलों में उन्हें प्रसव पीड़ा हुई , उस समय अत्यधिक उमस भरी गर्मी थी । माया देवी को विश्राम देने के लिए उन्हें रथ से नीचे उतार कर शाल के घने पत्तेदार वृक्ष के नीचे पत्तों की ठंडी छांव तले जमीन पर बिठाया गया जहां बालक सिद्धार्थ का जन्म हुआ ।  



जन्म के पश्चात सिद्धार्थ की माता माया देवी का देहांत हो गया । इनका पालन - पोषण इनकी मौसी गौतमी ने तौलीधवा नामक स्थान पर किया । बालक सिद्धार्थ जन्म से ही शांत स्वभाव के थे। 16 वर्ष की आयु तक क्षत्रियोचित शिक्षा ग्रहण कर यशोधरा नामक पत्नी का स्वयंवर में वरण किया । 



तीन वर्षों तक राजपाठ के विपुल वैभव का आनंद लेते रहे । इसी बीच राहुल नामक पुत्र रत्न भी प्राप्त किया , फिर भी संसार इन्हें असार प्रतीत होता था । इनके पिता शुद्धोदन इन्हें कुशल राजकुमार बनाना चाहते थे । उन्होंने इनके वैरागी मन को सांसारिक भावनाओं की तरफ मोड़ने के लिए एक दिन इन्हें स्वर्ण जड़ित रथ पर बिठाकर सारा नगर घुमाया गया । 



घूमते हुए अचानक इनकी दृष्टि एक वृद्ध , एक रोगी और एक मृतक के शव पर पड़ी । बुद्ध ने अपने सारथी से पूछा कि यह क्या है । सारथी ने उन्हें बताया , " राजकुमार ! यह घटना एक दिन हमारे और आपके साथ भी घटित होगी । " 



माया यही था मानव जीवन का यथार्थ , सत्य जिसे देख कर उनका हृदय द्रवीभूत हो उठा । वह सोचने लगे , " हम जन्म लेते हैं मरने के लिए , जवान होते हैं वृद्ध होने के लिए और स्वस्थ होते हैं रोगी होने के लिए । " उन्हें इन चार रूपों में दिखावटी संसार का नंगा रूप दिखाई दिया । 



वह जीवन और मृत्यु का निदान ढूंढने के लिए 29 वर्ष की अवस्था में कामिनी , कनक और कीर्ति की कामनाओं का पूर्णतः परित्याग कर सभी सांसारिक जंजीरों को तोड़ रात के अंधेरे में निकल पड़े सत्य की खोज में । सुंदर पत्नी यशोधरा का प्रेम , नवजात पुत्र राहुल का वात्सल्य और राजकीय विलास के साधन उनकी महायात्रा को रोक न सके । 



ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल लुम्बिनी की खोज 19 वीं शताब्दी में एक प्रसिद्ध जर्मन इतिहासकार डा . फ्यूरर ने की । भारत - नेपाल के सदियों पुराने धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को संजोए यह पुरास्थल अपने सीने में सदियों पूर्व का इतिहास समेटे वक्त की गर्त में समाया हुआ इंतजार कर रहा था , दुनिया भर के लोगों से रू - ब - रू होने को । 



पुरातत्ववेत्ताओं का अथक परिश्रम रंग लाया और लुम्बिनी की खुदाई से जो पुरासामग्री उभर कर सामने आई उनमें लखौरी ईंटों से निर्मित मंदिर का खंडहर , बौद्ध विहार एवं बुद्ध मूर्तियों सहित कई तरह की कलाकृतियां प्राप्त हुई हैं । इन कलाकृतियों में जो सबसे सुंदर मूर्ति मिली है वह भगवान बुद्ध की मां माया देवी की पत्थर की मूर्ति है । 



भगवान बुद्ध की जन्म स्थली होने के कारण यहां मौर्य सम्राट अशोक ने ई.पू. 249 में एक स्तम्भ लेख की स्थापना कराई थी , जिस पर मौर्यकालीन ब्रह्मी लिपि में ' हिद बुद्धे जातेति ' खुदा हुआ है । आसमानी बिजली गिरने के कारण यह स्तम्भ लेख दो टुकड़ों में विभक्त हो गया है , जो वर्तमान समय में खुले आसमान के नीचे खंडित अवस्था में स्थित है । 



 इस स्तम्भ लेख की पुष्टि स्वयं चीनी यात्री हवेन्सांग ने भी अपने यात्रा विवरण में की है । भगवान बुद्ध ने मध्य मार्ग ( ज्यादा सुख और दुख के बीच का रास्ता ) अपनाया । उनकी वाणी मीठी थी , भाषा सरल और उपदेश सीधे थे , भाव में कोई दुराव नहीं था , लोग मुग्ध हो भगवान के उपदेशामृत का पालन करते थे । 



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ऊंच - नीच , राजा - रंक सभी ने एक साथ भेदभाव रहित होकर बुद्ध की शरण ली । थोड़े ही दिनों में समूचे भारत में बुद्धं शरणम् गच्छामि , संघं शरणम् गच्छामि का नारा गूंजने लगा । भगवान बुद्ध का धर्म प्रचार अनवरत 40 वर्षों तक चलता रहा । 



अंत में उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पावापुरी नामक स्थान पर 80 वर्ष की अवस्था में ई.पू. 543 में वैशाख की पूर्णिमा को उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ । लुम्बिनी के उत्खनन से प्राप्त ईंटों द्वारा निर्मित मंदिर के अवशेष को माया देवी की सराय के नाम से जाना जाता है । यह स्थान खास तौर से उसी स्थान को दर्शाता है , जहां बुद्ध का जन्म हुआ था । 



यहां से मिली बुद्ध मूर्तियां व ऐतिहासिक महत्व की कलाकृतियों को सुरक्षा की दृष्टि से काठमांडू के राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थान दिया गया है । भगवान बुद्ध के जन्म स्थान लुम्बिनी के संरक्षण का जिम्मा चौथे अंतर्राष्ट्रीय बुद्ध सम्मेलन के दौरान वर्ष 1959 ई. में गठित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन के ऊपर है । 



आज विश्व भर के पर्यटकों , बौद्ध धर्मावलम्बियों तथा पुरास्थलों के रुचि रखने वाले लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता नेपाल राज्य का यह स्थान वैशाख पूर्णिमा के दिन ही आज से हजारों वर्ष पूर्व घटित होने वाली उन महान तीन घटनाओं ( बुद्ध का जन्म , ज्ञान - लाभ और शरीर त्याग ) से जुड़ा एक अहम और महत्वपूर्ण स्थान है ।




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सिद्धार्थ कैसे बने गौतम बुध | लुम्बिनी जहां जन्मे थे महात्मा बुद्ध | भगवान बुध की महागाथा Reviewed by Jeetender on January 12, 2022 Rating: 5

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